जीवत्पुत्रिका व्रत 10 सितम्बर 2020 बृहस्पतिवार को है। इस दिन सूर्योदय 5:50 बजे और अष्टमी तिथि का मान सम्पूर्ण दिन और रात्रि को 10:47 बजे तक है। वाराणसी हृषिकेश पंचांग के अनुसार रोहिणी नक्षत्र दिन मे 10:40 बजे के पश्चात मृगशिरा नक्षत्र है। चन्द्रमा वृष राशि पर स्थिति होने से अपने उच्च स्थिति मे रहेंगे। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पुत्र के आरोग्यता तथा सर्व विध कल्याण के लिए जीवत्पुत्रिका-जीवतीया या जिमूतवाहन व्रत का विधान धर्म शास्त्रकारों ने निर्दिष्ट किया है। प्रायः यह व्रत स्त्रियाँ ही करती हैं। इस व्रत में प्रदोष व्यापिनी अष्टमी को अंगीकार करते हुए आचार्यों ने प्रदोष काल में जिमूतवाहन के पूजन का विधान स्पष्ट शब्दों में किया है... प्रदोष समये स्त्रिभिः पूज्यो जीमूतवाहनः। यदि दो दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो पर दिन को ग्राह्य करना चाहिए। फिर यदि सप्तमी के उपरान्त अष्टमी हो तो वह भी ठीक है...
"सप्तयामुदिते सूर्ये परतश्चाष्टमी भवेद्।
तत्र वतोत्सवं कुर्यान्न कुर्यादपरेऽहनि।।
इस व्रत मे अष्टमी तिथि के पश्चात पारण करना चाहिए,ऐसा वर्षकृत्य का कथन है।
----व्रत विधान----
पवित्र होकर संकल्प के साथ व्रती प्रदोष काल में गाय के गोबर से अपने प्रांगण को उपलिप्त कर परिष्कृत करे और छोटा तालाब भी खोदकर बना ले। तालाब के निकट एक पकड़ की डाल लाकर खड़ा कर दे। शालिवाहन राजा के पुत्र धर्मात्मा जीमूतवाहन वाहन की कुश निर्मित मूर्ति,जल या मिट्टी के पात्र मे स्थापित कर पीली और लाल रूई से उसे अलंकृत करें तथा धूप ,दीप, अक्षत, फूल, माला एवं विविध प्रकार के नैवेद्यों से पूजन करें। मिट्टी या गाय के गोबर से चिल्ली या चिल्होरिन (मादा चील) और सियारिन की मूर्ति बनाकर उसका मस्तकों को लाल सिन्दूर से विभूषित कर दें। अपने वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए दिन भर उपवास कर बाॅस के पत्तों से पूजन करना चाहिए। तदन्तर व्रत माहात्म्य की कथा श्रवण करनी चाहिए। अपने पुत्र-पौत्र की लम्बी आयु एवं सुन्दर स्वास्थ्य की कामना से महिलाओं को विशेषकर सधवा को इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए।
----माहात्म्य की कथा----
प्रस्तुत कथा के वक्ता वैशम्पायन ॠषि हैं। बहुत पहले रमणीय कैलाश पर्वत के शिखर पर भगवान शंकर और पार्वती प्रसन्न मुद्रा में बैठे थे। परम दयालु माता गौरी ने महादेव जी से पूछा-प्रभो!किस व्रत और पूजन से शौभाग्यशाली नारियों के पुत्र जीवित एवं चिरंजीवी रहते हैं? कृपया उसके बारे में और उसकी कथा के बारे में बताने का कष्ट करें। त्रिकालज्ञ भगवान शंकर ने जीवत्पुत्रिका व्रता-जीवतीया व्रत के विधान, महत्व तथा माहात्म्य की कथा बताये हुए कहा- दक्षिणापथ मे समुद्र के निकट नर्मदा के तट पर कांचनावती नामक एक सुन्दर नगरी थी। वहाॅ के राजा मलय केतु थे उनके पास चतुतरंगिणी सेना थी। उनको नगरी धन-धान्य से परिपूर्ण थी। नर्मदा के पश्चिम तट पर बाहूटार नामक एक मरूस्थल था। वहाँ एक पाकड़ का पेड़ था उसकी जड़ मे बड़ा सा कोटर था। उस मे छिप कर एक सियारिन रहती थी। उसकी डाल पर घोंसला बनाकर एक एक चिल्होरिन रहती थी। रहते -रहते दोनो में मैत्री हो गयी थी। संयोगवश उसी नदी के किनारे उस नगर की सधवा स्त्रियाॅ अपने पुत्रों के आयुष्य और कल्याण की कामना से जिमूतवाहन का व्रत और पूजन कर रही थी। उनसे सब जानकर चिल्होरिन और सियारिन ने भी व्रत करने का संकल्प कर लिया।
व्रत करने के कारण भूख लगने स्वाभाविक थी। चिल्होरिन ने भूख सहन कर रात व्यतीत कर दिया परन्तु सियारिन भूख से छटपटाने लगी। वह नदी के किनारे जाकर माॅस भक्षण कर ली। कुछ समय पश्चात वे दोनो प्रयाग मे आकर तीर्थ सेवन के अनन्तर प्राण त्यागकर दोनों एक वेदज्ञ ब्राह्मण के वहाँ जन्म ग्रहण कीं। चिल्होरिन का शीलवती नामकरण हुआ और सियारिन का नाम कर्पूरावती नाम रखा गया था। शीलवती का विवाह मन्त्री बुद्धिसेन से और कर्पूरावती का विवाह राजा मलयकेतु साथ हुआ। समय पर दोनों के सात-सात पुत्र पैदा हुए, परन्तु कर्पूरावती के पुत्र काल के गाल मे समाते गये। एक दिन राजा मलयकेतु से मन्त्रणा कर कर्पूरावती ने उसके सातो पुत्रों को मरवाकर शीलवती के पास भिजवा दी, परन्तु भगवान जीमूतवाहन ने उनके सिर और धड़ को जोड़कर उन्हे जीवित कर दिया। यह देखकर राजा और कर्पूरावती को बड़ा आश्चर्य और पश्चाचाताप हुआ। वे राज्य को अपने मन्त्री को देकर तपस्या करने के लिए चले गये। शीलवती अपने पति और पुत्रों के साथ सुखपूर्वक जीवन यापन की। जीवत्पुत्रिका व्रत के प्रभाव से उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो गये।
इस प्रकार माहात्म्य की कथा बताने के बाद भगवान शंकर जी ने कहा कि जो सौभाग्यवती स्त्री जीमूतवाहन को प्रसन्न करने के लिए व्रत और पूजन करती है एवं व्रत के माहात्म्य को को श्रवणकर ब्राह्मण को दक्षिणा देती है,वह अपने पुत्र के साथ जीवन व्यतीत कर अन्त में भगवान विष्णु के लोक को प्रयाण करती है।
आचार्य पं शरदचन्द मिश्र अध्यक्ष-रीलीजीयस स्कालर्स वेलफेयर सोसायटी गोरखपुर ।
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