मानो तो गंगा मां हूं...

गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई है। इनमें राजा सगर की कथा और मिथकों के अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु के पैर के पसीनों की बूंदों से गंगा के अन्य कथाए भा काफी रोचक है। 



भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा जो भारत और बांग्लादेश में मिलाकर 2,510 किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू भाग को सींचती है, देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना मां और देवी के रूप में की जाती है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौंदर्य और महत्व के कारण बार- बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं।


राजा सगर


एक अन्य कथा के अनुसार राजा सगर ने जादुई जादुई रूप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की। एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिये घोड़ा आवश्यक था जो ईर्ष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया अंत में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के आश्रम के समीप बंधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच कर कि ऋषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया। तपस्या में लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गये। सगर के पुत्रों की आत्माएं भूत बनकर विचरने लगी क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। सगर के पुत्र अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का असफल प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी। भगीरथ राजा दिलीप की दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके संस्कार की राख गंगाजल में प्रवाह कर भटकती आत्माएं स्वर्ग में जा सकें। भगीरथ ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके। ब्रह्मा प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुए और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बाद पाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों के आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊंचाई से जब पृथ्वी पर गिरूंगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहां सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं।



  • ब्रह्मा का कमंडल से का जन्म


एक प. फुल्लित सुंदरी युवती का जन्म ब्रह्मदेव के कमंडल से हुआ इस खास जन्म के बारे में दो विचार हैं। एक की मान्यता है कि वामन रूप में राक्षस बलि से संसार को मुक्त कराने के बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु का चरण धोया और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया। दूसरे का संबंध भगवान शिव से है जिन्होंने संगीत के दुरूपयोग से पीड़ित राग-रागिनी का उद्धार किया। जब भगवान शिव ने नारद मुनि ब्रह्मदेव तथा भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से भगवान विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा जो ब्रह्मा ने उसे अपने कमंडल में भर लिया। इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ और वह ब्रह्मा के संरक्षण में स्वर्ग में रहने लगी। गंगा, एक नदी ही नहीं, भारतीय संस्कृति की एक गौरवशाली सरिता है। देवनदी, जाह्नवी, विष्णुपदा, शिवशीशधारिणी जैसे 108 विभिन्न नामों से जाना जाता हैं। 'महाभागवत' में 'गंगा अष्टोत्तरशत नामावली' मिलती है। यह ऐसी नदी है जिसका जिक्र ऋवेद से लेकर वर्तमान साहित्य तक में मिल जाता है। राजा भागीरथ के तप के प्रभाव से यह अलकनंदा से भगीरथी होकर भारत के कलिकलुष को धोती हुई समुद्रगामी हुई। गंगा दशहरा या गंगादशमी का पर्व 10वीं सदी पूर्व से ही मनाया जाता रहा है। भोजराज ने 'राजमार्तण्ड' में दशपापों के निवारण के पर्व के रूप में इस दिवस का स्मरण किया है। जो दस पाप हरे, वह यह पर्व है। इन पापों का जिक्र सर्वप्रथम मनु ने अपनी स्मृति में किया है, जिनको यथारूप 'स्कंदपुराणकार' सहित अन्य पुराण, उपपुराणकारों ने भी उद्धत किया है। मूर्तिकला में गंगा की अभिव्यक्ति नई नहीं है। गुप्तकाल से ही स्त्री रूप में यह नदी कलशधारिणी नायिका के रूप में उत्कीर्ण की जाने लगी। विशेषकर द्वारशाखा के नीचे मूर्तिमय रूप में गंगा का न्यास मिलता है।


गंगा और राजा शांतनु 


भरतवंश में शान्तनु नामक बड़े प्रतापी राजा थे। एक दिन गंगा तट पर आखेट खेलते समय उन्हें गंगा देवी दिखाई पड़ी। शान्तनु ने उससे विवाह करना चाहा। गंगा ने इसे इस शर्त पर स्वीकार कर लिया कि वे जो कुछ भी करेंगी उस विषय में राजा कोई प्रश्न नहीं करेंगे। शान्तनु से गंगा को एक के बाद एक सात पुत्र हुए। परन्तु गंगा देवी ने उन सभी को नदी में फेक दिया। राजा ने इस विषय में उनसे कोई प्रश्न नहीं किया। बाद में जब उन्हें आठवां पुत्र उत्पन्न हुआ तो उसे नदी में फेंकने के विरुद्ध शान्तनु ने आपत्ति की। इस प्रकार गंगा को दिया गया उनका वचन टूट गया और गंगा अपना विवाह रद्द कर स्वर्ग चली गयीं। जाते जाते उन्होंने शांतनु को वचन दिया कि वह स्वयं बच्चे का पालन-पोषण कर बड़ा कर शान्तनु को लौटा देंगी।


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