इस वर्ष विवाह पंचमी एक नवम्बर रविवार के दिन पड़ रहा है। इसी शुभ मुहूर्त में भगवान राम और सीता का विवाह हुआ था। विवाह केवल स्त्री और पुरुष के गृहस्थ जीवन में प्रवेश का ही प्रसंग नहीं है बल्कि यह जीवन को संपूर्णता देने का अवसर है। श्रीराम के विवाह के जरिए हम विवाह की महत्ता और उसके गहन अर्थों से रूबरू हो सकते हैं। भारत में कई स्थानों पर विवाह पंचमी को बड़ी धूमधाम से मनाया गया। मार्गशीर्ष (अगहन) मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को भगवान श्रीराम तथा जनकपुत्री जानकी (सीता) का विवाह हुआ था। तभी से पंचमी को विवाह पंचमी पर्व के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस तिथि को भगवान राम ने जनक नंदिनी सीता से विवाह किया था। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीराम ने विवाह द्वारा मन के तीनों विकारों काम, क्रोध और लोभ से उत्पन्न से उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया है। श्री रामकिंकर जी महाराज ने राम विवाह की बड़ी ही सुंदर व्याख्या करते हुए लिखा है, संसार के विवाह और श्रीराम के मंगलमय विवाह में अंतर क्या है? यह जो भगवद्-रस है, वह व्यक्ति को बाहर से भीतर की ओर ले जाता है। और बाहर से भीतर जाना जीवन में परम आवश्यक है। व्यवहार में भी आप देखते हैं, अनुभव करते हैं कि जब तीव्र गर्मी पड़ने लगे, धूप हो तो आप क्या करते हैं? बाहर से भीतर चले जाते हैं। वर्षा में भी आप बाहर से भीतर चले जाते हैं, अर्थात बाहर चाहे वर्षा या धूप हो, घर में तो आप सुरक्षित हैं। इसी प्रकार जीवन में भी कभी वासना के बादल बरसने लगते हैं, क्रोध की धूप व्यक्ति को संतप्त करने लगती है, मनोनुकूल घटनाएं नहीं घटती हैं, ऐसे समय में अगर हम अंतर्जगत में, भाव राज्य में प्रविष्ट हो सकें तो एक दिव्य शीतलता, प्रेम और आनंद की अनुभूति होगी। भगवान श्री सीताराम के विवाह को हम अन्तर्हृदय में देखें, ध्यान करें, लीला में स्वयं सम्मिलित हों, इस विवाह का उद्देश्य है। इस विवाह के संदर्भ में गोस्वामीजी ने वर्णन किया है कि विवाह को ज्ञानियों ने किस दृष्टि से देखा, योगियों ने क्या अर्थ लिया? भक्तों ने इसमें कैसा परमानंद पाया? और उन्होंने दो कथित विरोधी काम और राम में विलक्षण समन्वय तब बैठाया, जब विवाह मंडप में दोनों को एक साथ प्रस्तुत किया। विवाह का प्रमुख देवता काम है। पर इस प्रसंग में काम राम का विरोधी न रहकर सहयोगी बन गया। भारतीय संस्कृति में श्रीरामसीता आदर्श दंपति हैं। श्रीराम ने जहां मर्यादा का पालन करके आदर्श पति और पुरुषोत्तम पद प्राप्त किया वहीं माता सीता ने सारे संसार के समक्ष अपने पतिव्रता धर्म के पालन का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। इस पावन दिन सभी दंपतियों को श्रीरामसीता से प्रेरणा लेकर अपने दांपत्य को मधुरतम बनाने का संकल्प करना चाहिए।
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